UP Politics में ‘PDA’ की एंट्री, सियासत में नई केमिस्ट्री या पुरानी केमिस्ट्री?

अजमल शाह
अजमल शाह

उत्तर प्रदेश की सियासत में 15 मार्च अब सिर्फ जयंती नहीं, बल्कि पावर-शो का मंच बनने जा रही है। Kanshi Ram की जयंती पर Samajwadi Party ने ‘PDA दिवस’ मनाने का ऐलान कर दिया यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक एकता का सियासी फॉर्मूला।

लेकिन जैसे ही यह घोषणा हुई, राजनीतिक थर्मामीटर का पारा चढ़ गया। सवाल यह नहीं कि दिवस मनाया जाए या नहीं… सवाल यह है कि “किस नीयत से?”

‘राजनीतिक नाटकबाजी’ या सोशल इंजीनियरिंग?

Mayawati ने इसे सीधे-सीधे “राजनीतिक नाटकबाजी” करार दिया। उनका कहना है कि जिनके शासनकाल में बहुजन प्रतीकों के नाम बदले गए, वे आज सामाजिक न्याय की मशाल कैसे उठा रहे हैं?

उन्होंने 1993 के गठबंधन और 2 जून 1995 के चर्चित Lucknow State Guest House incident की याद भी दिला दी। संदेश साफ था — “इतिहास गूगल से डिलीट नहीं होता।”

बसपा की दलील है कि प्रतीकों की राजनीति और वास्तविक सम्मान में फर्क होता है। नाम बदलना और मंच सजाना आसान है, भरोसा बनाना मुश्किल।

सपा का जवाब: PDA है New Political Formula

सपा की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि PDA कोई इवेंट मैनेजमेंट नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन की रणनीति है। पार्टी नेताओं का कहना है कि कांशीराम के ‘सामाजिक परिवर्तन’ के विज़न को नई पीढ़ी तक ले जाना जरूरी है।

उनका दावा है अगर पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक एक मंच पर आएंगे तो राजनीति का नैरेटिव बदलेगा।

नामकरण की राजनीति: प्रतीक बनाम सत्ता

बसपा ने कांशीराम नगर (कासगंज) और संत रविदास नगर (भदोही) जैसे नामों के बदलाव का मुद्दा फिर उठा दिया। सवाल सीधा है क्या सम्मान सिर्फ भाषणों में रहेगा या प्रशासनिक फैसलों में भी दिखेगा?

सियासत में मेमोरी बहुत लंबी होती है। जो फैसले सालों पहले हुए, वे आज भी बयानबाजी का ईंधन बनते हैं।

जयंती का संदेश या चुनावी मैसेजिंग?

15 मार्च को PDA दिवस मनाया जाएगा यह तय है। लेकिन असली परीक्षा यह है कि यह आयोजन सामाजिक समरसता का मंच बनेगा या आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा। UP की राजनीति में Social Justice एक विचार से ज्यादा, एक चुनावी गणित भी है और फिलहाल दोनों दल उसी गणित को अपने-अपने कैलकुलेटर से हल कर रहे हैं।

असेंबली में ‘वाइल्ड गेस्ट’!” गाजियाबाद स्कूल में तेंदुए की एंट्री, एग्जाम कैंसल

Related posts

Leave a Comment